अभी नहीं होगी इस बोली की बोलती बंद ! दोरलों के इलाकों में हिन्दी नहीं हो पाई हावी

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अभी नहीं होगी इस बोली की बोलती बंद ! दोरलों के इलाकों में हिन्दी नहीं हो पाई हावी

पंकज दाऊद @ बीजापुर। गोदावरी और शबरी नदियों के बीच या ईर्द-गिर्द बसने वाली दोरला जनजाति की बोली दोरली पर फिलहाल कोई खास खतरा नहीं मण्डरा रहा है क्योंकि अभी उनके इलाकों में हिन्दी ज्यादा हावी नहीं हो पाई है। ये बात तो जरूर है कि कुछ इलाकों में इस बोली में तेलुगू और गोण्डी का पुट झलकता है।

सूत्रों के मुताबिक अभी सुकमा जिले में दोरली का प्रभाव कम पड़ गया है ओैर यहां ज्यादातर दोरले गोण्डी बोलते हैं। वहीं बीजापुर जिले के उसूर ब्लॉक के कई गांवों में दोरली ही प्रभावी है।

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उसूर ब्लॉक के लंकापल्ली गांव के सरपंच नारायण मोड़ियम बताते हैं कि इलमिड़ी, लंकापल्ली, जिनिप्पा, उसूर, आवापल्ली, मुरदोण्डा, कमारगुड़ा, एटलापल्ली, चिलकापल्ली, मारूड़वाका, नैलाकांकेर, पुसवाका, नंबी, गुंजापरती एवं कई गांवों में दोरली की शुद्धता कायम है।

तेलंगाना के सटे गांव संगनपल्ली, आईपेंटा, पुजारी कांकेर आदि गांवों में तेलुगू की झलक इस बोली में दिख जाती है। तेलंगाना से दूर होने के बाद भी मुरकीनार, पुसगुड़ी एवं सण्डरेल में भी दोरली में तेलुगू का प्र्रभाव दिखता है।

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लंकापल्ली गांव के ही युवक मड़े सुरेश बताते हैं कि बासागुड़ा, पेदागेलूर एवं चिन्नागेलूर इलाके में गोण्डी मिश्रित दोरली बोली जाती है। बताया गया है कि अंदरूनी गांवों में हिन्दी भाषियों के कम होने के कारण इस बोली पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है।

पहनावे में बदलाव

जमाने के साथ अब दोरलों के पहनावे में भी असर पड़ने लगा है। पहले पुरूष गमछा, लुंगी और पगड़ी पहना करते थे लेकिन अब ये पहनावा बदल गया है। युवा पीढ़ी आधुनिक कपड़े की शौकीन हो गई है। वहीं युवतियों पहले महाराष्ट्र की मानिंद साड़ी पहनती थीं लेकिन अब वे सलवार पहनने लगी हैं।

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हर साल 200 बोलियों का विलुप्तिकरण

मानवविज्ञानियों की मानें तो दुनिया में हर साल करीब 200 बोली-भाषाओं को विलुप्तिरकरण हो रहा है। इसके पीछे समुदाय का अपनी बोली या भाषा बोलने के पीछे संकोच है।

समुदाय के लोगों को बाहर काम करने जाना या बाहरी लोगों से जुड़ाव भी एक महत्वपूर्ण कारण है। नृविज्ञानियों की मानें तो आम तौर पर नई भाषाओं की ओर लोग ज्यादा आकर्षित होते हैं और ये भी विलुप्तिकरण की वजह है।