बस्तर से कश्मीर तक बही खुशियों की बयार, हजारों ग्रामीणों के बीच कोबरा कमाण्डो को मिली आजादी

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बस्तर से कश्मीर तक बही खुशियों की बयार, हजारों ग्रामीणों के बीच कोबरा कमाण्डो को मिली आजादी

पंकज दाउद @ बीजापुर। नक्सलियों ने तीन अप्रैल को तर्रेम के जंगल में मुठभेड़ के बाद अगवा किए गए सीआरपीएफ की कोबरा 210 बटालियन के जवान जम्मू निवासी राकेश्वर सिंह मनहास को छह दिनों बाद मध्यस्थतों और ग्रामीणों की मौजूदगी में छोड़ दिया।

हजारों लोगों के बीच सीआरपीएफ की 210 कमाण्डो बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास के हाथों में बंधी रस्सी जब खुली तो उन्होंने राहत की सांस ली और फिर उनके बासागुड़ा आते ही बस्तर से कश्मीर तक खुशियों की बयार चल पड़ी।

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तीन अप्रैल को बासागुड़ा और तर्रेम से गए सीआरपीएफ, एसटीएफ और डीआरजी के जवान सर्चिंग पर निकले थे। जोनागुड़ा के पास नक्सलियों से उनकी मुठभेड़ हो गई जो तीन से चार घंटे तक चली। इस वारदात में 22 जवान शहीद हो गए।

इस दौरान नक्सलियों ने राकेश्वर को पकड़ लिया और अपने साथ ले गए। अगले दिन ही नक्सलियों ने उसके अगवा होने की पुष्टि मीडियाकर्मियों से की। नक्सलियों ने राकेश्वर को मुक्त करने शर्त रखी थी और मध्यस्थ की मौजूदगी का जिक्र किया था।

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हालांकि, मध्यस्थों के नामों का खुलासा राज्य सरकार और ना ही केन्द्र सरकार ने किया। मध्यस्थों में माता रूक्मिणी सेवा संस्थान के संस्थापक एवं संचालक पदमश्री धर्मपाल सैनी और गोण्डवाना समाज के जिला अध्यक्ष रिटायर्ड षिक्षक तेलम बोरैया, सुकमती अपका के अलावा एक पत्रकार शामिल थे। इनके साथ कुछ मीडियाकर्मी भी गए थे।

बताया गया है कि मध्यस्थ गुरूवार की सुबह निकले थे। मध्यस्थों के साथ नक्सली लीडर ने लंबी बातचीत की और हजारों ग्रामीणों की मौजूदगी में राकेश्वर सिंह को सौंप दिया। दोपहर करीब तीन बजे मध्यस्थ कमाण्डों को लेकर तर्रेम थाने पहुंचे।

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अब तक ये खुलासा नहीं हुआ है कि नक्सलियों ने किस शर्त पर राकेश्वर सिंह मनहास को मुक्त किया है। बताया जा रहा है कि नक्सलियों ने लोगों के सामने पेश करने से पहले उनके हाथ बांध रखे थे। सबसे सामने जवान के ​हाथ में बंधी रस्सी खोली गई और रिहा कर दिया गया।

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