आदिवासी दिवस पर भी सिलगेर की महसूस हुई तपिश… गंगालूर में जुटे हजारों लोग, हक लेने आवाज बुलंद की

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आदिवासी दिवस पर भी सिलगेर की महसूस हुई तपिश… गंगालूर में जुटे हजारों लोग, हक लेने आवाज बुलंद की

पंकज दाउद @ बीजापुर। यहां से 22 किमी दूर गंगालूर गांव में विश्व आदिवासी दिवस पर प्रस्तुत गीतों के माध्यम से युवाओं ने सिलगेर गोलीकाण्ड की जांच और महिलाओं पर अत्याचार के मसले उठाए। यहां फोर्स के कैम्पों को बंद करने की मांग भी की गई।

गंगालूर में बाजार स्थल पर आसपास के गांवों से हजारों लोग आए थे। कार्यक्रम के दौरान युवाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य पेश किया। इस नृत्य के जरिए युुवाओं ने आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार की बात उठाते कहा कि फर्जी केस में आदिवासियों को जेल में बंद करना बंद किया जाए। युवाओं ने इसके लिए भूपेश सरकार पर भी तोहमत लगाई।

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इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि हम आदिवासी लता की तरह हैं लेकिन हमें पेड़ों की तरह बनना है। यानि हमें किसी भी सहारे के बिना बढ़ना है। जब तक हम शिक्षित नहीं होंगे, हमें अधिकार नहीं मिल सकते हैं। उन्होंने कहा कि पेसा कानून और पांचवी अनुसूची आदिवासी हित में बने हैं।

समूचे बस्तर में पांचवी अनुसूची लागू है लेकिन इसका पालन नहीं हो पा रहा है और काफी हद तक हमारे जनप्रतिनिधि भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। सभा में मुख्य रूप से पाण्डूराम तेलम, हरिकृष्ण कोरसा, कामेश्वर दुब्बा, अमित कोरसा, नरेन्द्र हेमला, गुज्जा राम पवार, बुधराम साहनी, दिलीप उइके, तारकेश्वर पैंकरा, गंगाधर मांझी, आदिनारायण पुजारी एवं अन्य मौजूद थे।

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मकसद है उत्थान का

वक्ताओं ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सभा के फैसले पर विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है। दुनिया में तीन हजार से ज्यादा जनजातियां रहती हैं और अकेले छत्तीसगढ़ में 42 जनजातियां हैं। आज का दिन सिर्फ भाषण के लिए नहीं है बल्कि आज का दिन आदिवासियों के उत्थान के तरीके पर मंथन करने का दिन है।

दखल का प्रावधान नहीं

वक्ताओं ने कहा कि आदिवासियों की अलग प्रथाएं हैं और इन पर किसी को भी दखल का अधिकार नहीं है। आदिवासी ना तो हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई या किसी धर्म के नियमों पर नहीं चलता है। उसकी अपनी परंपरा है। आदिवासी प्रकृतिवादी होते हैं। वे पेरमा और गायता के अनुसार चलते हैं। जहां तक बलि सरीखी कुप्रथाएं हैं, इन्हें काफी पहले खत्म कर दिया गया है।

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