बासागुड़ा को वनोपज मार्केट के तौर पर ढाला था हाजी शेख हाशम ने… 93 की उम्र में इंतकाल

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बासागुड़ा को वनोपज मार्केट के तौर पर ढाला था हाजी शेख हाशम ने… 93 की उम्र में इंतकाल

पंकज दाऊद @ बीजापुर। बस्तर के अंदरूनी गांव बासागुड़ा में जब वहां के आदिवासी शहद, तिखूर, इमली, महुआ और चिरौंजी का मोल नहीं जानते थे, तब इस गांव के बाशिंदे हाजी शेख हाशम ने इन वनोपजों को आदिवासियों की जिंदगी से जोड़ा और इसका कारोबार करना सिखा दिया। हौले-हौले बासागुड़ा एक बड़े वनोपज बाजार के तौर पर उभरा।

दक्षिण बस्तर के सबसे पहले हाजी बने शेख हाशम (93) का मंगलवार की रात साढ़े 12 बजे यहां अटल आवास में निधन हो गया। उनकी देहांत की खबर सुनते ही दूर-दूर से नाते-रिश्तेदारों और परिचितों का आना शुरू हो गया। वे मुसलमान समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे।

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लोग उन्हें हाशम दादा के नाम से भी जानते थे। शेख हाशम उस जमाने में लैम्प्स प्रबंधक थे और घोड़े व साइकिल से सफर करते थे। उन्होंने कुछ दिनों बाद नौकरी छोड़ दी और गल्ले के पुश्तैनी कारोबार से जुड़ गए। उनेके पिता स्व शेख हबीब भी इसी कारोबार से जुड़े थे।

बताते हैं कि वनोपज के कारोबार में उनका कोई सानी नहीं था। आदिवासियों को वनोपज के दाम से अवगत उन्होंने ही करवाया। इसके बाद तो बासागुड़ा के साप्ताहिक हाट में आसपास के गांवों से भारी मात्रा में वनोपज आने लगा।

शेख हाशम मार्केट में वनोपज खरीदकर शहरों में बेचते थे। ज्यादातर वनोपज वे धमतरी के बड़े कारोबारियों को बेचते थे। इसके अलावा उनका माल जगदलपुर एवं रायपुर भी जाता था।

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जुड़ूम के बाद छोड़ना पड़ा गांव

सलवा जुड़ूम शुरू होने के बाद खूनखराबा बढ़ गया और वे जगदलपुर शिफ्ट हो गए। इसके बाद 2007 में वे बीजापुर में अपने बेटों के पास आ गए। उनकी पांच बेटियां एवं दो बेटेे थे। इनमें से एक बेटे व एक बेटी का निधन हो गया है। दरअसल, उनके पिता शेख हबीब नकुलनार के रहने वाले थे। फिर वे कुटरू शिफ्ट हो गए। कुछ सालों बाद वे पूरे परिवार को लेकर बासागुड़ा में बस गए।

मिट्टी के बदले चावल !

हाजी शेख हाशम रहमदिल इंसान के तौर पर भी जाने जाते थे। एक बार बासागुड़ा इलाके में अकाल पड़ा। तब शेख हाशम ने बासागुड़ा एवं आसपास के गांव के लोगों का एक साल तक अन्न दिया। तब शेख हाशम एक बड़े व्यापारी थे। जरूरतमंद उनके पास आते और चावल-दाल आदि ले जाते।

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कुछ ऐसे भी जरूरतमंद होते थे जो काफी स्वाभिमानी होते थे। वे मुफ्त में कुछ ले जाना नहीं चाहते थे। ऐसे लोग हाजी हाशम के घर आकर मिट्टी दे जाते थे क्योंकि उनके पास कुछ होता नहीं था और इसके बदले वे अनाज ले जाया करते थे।



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