पर्दे के पीछे..!

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Parde-ke-Peechhe
  • आसमान से गिरे फेसबुक पर अटके…

पुरानी सरकार के एक कद्दावर मंत्री का इन दिनों सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त कट रहा है। बेचारे करें भी क्या..? एक तो चुनाव हार गए ऊपर से सत्ता भी चली गई। वैसे, मंत्री रहते इन पर आरोप लगता रहा है कि वे केवल हवाई सफर करते हैं। क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओं की उन्हें जरा भी‍ फिक्र नहीं रहती। वे हेलीकॉप्‍टर से अपने विधानसभा में आते हैं और इसी से वापस भी लौट जाते हैं। खैर, चुनाव में मिली शिकस्त से उन्होंने सबक लिया है और देर आए दुरूस्त आए की तर्ज पर अब वे ‘प्रायश्चित’ करते दिख रहे हैं। इसके लिए साहब ने सहारा लिया है सोशल मीडिया का। फेसबुक पर पूर्व मंत्री आए दिन किसी न किसी का बर्थडे विश करते नजर आते हैं। शादी की सालगिरह हो या किसी का बर्थडे, तमाम तरह की शुभकामनाएं अब उनकी ओर से आने लगी हैं। वैसे, सत्‍ता में रहते महोदय ने कईयों का तो सालों फ्रेंड रिक्वेस्ट भी एक्‍सेप्‍ट नहीं किया था।

  • सत्‍ता बदली पर तेवर नहीं बदले…

सीएम भूपेश बघेल के बस्तर प्रवास के दौरान सत्‍तारूढ़ पार्टी के एक नेता और पुलिस के एक आला अफसर कार्यक्रम स्‍थल में ही भिड़ गए। दरअसल, हर किसी की मंशा होती है कि सीएम के आसपास मंडरा कर फोटो खिंचा लें और इसे सोशल मीडिया में वायरल करें। ऐसी ही ख्वाहिश लेकर कार्यकर्ता नेता के पास पहुंचे थे। अब नेताजी भी भला क्‍या करें। सामने उपचुनाव को देखते कार्यकर्ताओं को नाराज भी तो नहीं कर सकते। इसी कशमकश में मंच के सामने ही उनकी पुलिस अफसर से तीखी बहस हो गई। हालांकि, बाद में कुछ प्रशासनिक अफसरों ने बीच बचाव करते मामले को शांत कराया। लोग कह रहे हैं कि अफसर की भी क्‍या गलती है। पूर्व शासन में उन्‍होने ऐसे ही तेवर दिखाए थे लेकिन साहब शायद ये भूल गए कि सत्‍ता बदल गई तो तेवर भी बदलने होंगे।

  • इसमें तेरा घाटा, मेरा कुछ नहीं जाता…
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दक्षिण बस्‍तर के एक जिले में प्रशासिनक फेरबदल के बाद अफसर बजट का रोना रो रहे हैं। इसे प्रशासनिक फेरबदल कहें या फिर सत्‍ता परिवर्तन का असर। कारण चाहे कुछ भी हो, लेकिन बजट के मामले में धन कुबेर माने जाने वाले जिले में अब बजट की कमी अफसरों को खलने लगी है। मौजूदा अफसर पूर्व अधिकारी पर इसका ठीकरा फोड़ रहे हैं। दरअसल, पूर्व अधिकारी को ये अंदेशा नहीं था कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होगा, लेकिन हुआ इसके उलट। सत्‍ता बदली तो साहब भी बदल दिए गए। नए साहब ने अलादीन के चिराग को तो रगड़ा, लेकिन न तो जिन्‍न बाहर निकला और न ही कोई मुराद पूरी हो पा रही है। आपा खोकर साहब ने तो पूर्व अधिकारी पर अपनी जमकर भड़ास भी निकाल डाली, लेकिन पुराने साहब राजधानी में बैठे शायद यही सोच रहे हैं… ‘इसमें तेरा घाटा, मेरा कुछ नहीं जाता।’

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  • भीषण आग दिलाए राहत

आपको ये पढ़कर आश्‍चर्य जरूर हो रहा होगा कि भीषण आग भला राहत कैसे दे सकती है? दरअसल, एक नए सरकारी भवन में आग लगने से जिले के दो अफसरों को बड़ी राहत मिलती दिख रही है। क्‍योंकि यहां उन्‍होंने मौजूद सामानों से ज्‍यादा सामान खरीदना बताया था। जांच की बारी आती इससे पहले भवन में आग लग गई। (कईयों का दबीं जुबां यह भी कहना है कि कहीं आग लगा तो नहीं दी गई) बहरहाल, खबर है कि इन दोनों अफसरों पर कानूनी डंडा भी चलने वाला है। इस डंडे की लंबाई न बढ़े, इसलिए इन्‍हें ये आग राहत दिला सकती है। अब इस घटना के बाद जिले के ही एक प्रशिक्षण देने वाली संस्था के प्रमुख भी शायद यही सोच रहे होंगे कि काश, ये आग मेरी भवन में लग जाती। इन महोदय को जांच से बचने के लिए ही एक माह से ज्‍यादा समय राजधानी में बिताना पड़ा। और तो और, उनके एक मातहत पर कार्रवाई की गाज ऐसे गिरी की उनकी सेवा ही समाप्‍त हो गई।

  • सीएस की कुर्सी में चुंबकीय बल…
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दक्षिण बस्तर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की एक कुर्सी में चुंबकीय बल देखने को मिल रहा है। इस कुर्सी में आसीन अफ़सर कुर्सी छोड़ना ही नहीं चाहते। इस अफ़सर पर गड़बड़ी के आरोप लगातार लगते रहे हैं। कुछ दिनों के लिए अफ़सर कुर्सी से अलग हुए पर जल्द ही अपनी वापसी भी करा ली। हाल ही में एक बार फिर इनकी कुर्सी डगमगा गई और नए अफ़सर को मौका मिला। लेकिन पुराने साहब को कुर्सी छोड़ने के लिए 15 दिन का वक़्त दिया गया है। अब साहब इन 15 दिनों के भीतर कुर्सी से फिर चिपकने की जुगाड़ में लग गए हैं। इसे कुर्सी की चुंबकीय शक्ति कहें या फिर मलाईदार कुर्सी का मोह। ख़ैर, कारण जो भी हो, कुर्सी आखिर कौन छोड़ना चाहता है।

 @ वेदप्रकाश संगम » महफूज़ अहमद


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