बारूद के ढेर में ‘कखगघ’ की महक… नक्सल ‘प्रभुत्व’ वाले गांवों में खुल गए 150 स्कूल, 6 हजार बच्चों तक पहुंची शिक्षा

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बारूद के ढेर में ‘कखगघ’ की महक… नक्सल ‘प्रभुत्व’ वाले गांवों में खुल गए 150 स्कूल, 6 हजार बच्चों तक पहुंची शिक्षा

पंकज दाउद @ बीजापुर। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के डेढ़ सौ गांवों में वामपंथ अतिवाद के चलते डेढ़ दशक से बंद 150 स्कूल भूपेश सरकार के काल में फिर से खुल गए और शिक्षा के रास्ते करीब 6 हजार बच्चे सीधे मेन स्ट्रीम से जुड़ गए। इन बच्चों का भाग्य स्याह अंधेरे से निकलकर लोकतंत्र के उजाले में आ गया।

जिले में माओवाद के खात्मे के लिए 2005 में सलवा जुड़ूम यानि शांति अभियान शुरू किया गया। तब एक भयंकर हिंसा का दौर शुरू हुआ। गांव के लोगों को अपने खिलाफ उठ खड़े होते देख नक्सलियों ने फोर्स के सहयोगियों का कत्लेआम शुरू किया। कई गांव इस हिंसा में उजाड़ हो गए।

लोग सरकार की ओर से बनाए गए राहत शिविरो में बस गए। कुछ परिवार गांवों में ही रह गए जिन्हें माओवादियों के रहमोकरम पर ही रहना पड़ा। फोर्स कहीं अपना ठौर ना बना ले, इसे देख माओवादियों ने स्कूल भवनों को ढहाना शुरू कर दिया। अब अंदरूनी गांवों में स्कूलों का संचालन बंद हो गया।

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गांव के बच्चे या तो दूर गांवों में आश्रम शालाओं में जाकर पढ़ने लगे या फिर उनके सामने अशिक्षित रहने का विकल्प रह गया। एक साल पहले ही कोरोना काल में इन स्कूलों को खोलने की कदमताल शुरू की गई। ये स्कूल ऐसे गांवों में हैं, जहां बाहरी लोगों यहां तक कि सरकारी अमले की आमद पर भी पाबंदी है।

शिक्षा विभाग की ओर से गांव के लोगों से किसी तरह संपर्क किया गया। बैठकों का दौर चला। लोग अपने गांवोें में स्कूल खोलने पर राजी हो गए। समझा जाता है कि इसमें नक्सलियों की भी रजामंदी थी। ये बात लेकिन खुलकर सामने नहीं आई है।

जिले में ऐसे डेढ़ सौ स्कूल खोले गए और गांव में पढ़ने लायक बच्चों का जब सर्वे किया गया तो एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया। पता चला कि इन डेढ सौ गांवों में 5760 बच्चे हैं और इनका दाखिला किया जाना है। सीधी बात तो ये है कि स्कूल नहीं खुलते तो इतने बच्चे कभी पढ़ ही नहीं पाते। ये एक बड़ी तादाद है।

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ये गांव अंदरूनी इलाकों में बसे हैं, जहां बारिश में आवागमन ठप हो जाता है। रास्ते भी नहीं बन पाए हैं तो पुल की बात दूर। अब इन 6 हजार बच्चों को कापी, किताब, स्कूल ड्रेस, मिड डे मील्स के अलावा छात्रवृत्ति भी मिल रही है।

इनके आधार कार्ड और आयुश्मान कार्ड बनने लगे हैं। स्कूल खुलने से एक और फायदा निकट भविष्य में ये होगा कि दीगर सरकारी अमलों के लिए गांव में योजनाओं के संचालन का रास्ता खुल जाएगा।

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ज्ञानदूत आए, गांव में ही रोजगार?

इन नए स्कूलों में शिक्षक यानि ज्ञानदूतों की पदस्थापना की गई। गांव के ही उन युवाओं को ज्ञानदूत नियुक्त किया गया, जो बारहवीं पास थे। इन्हें महीने में 10 हजार रूपए का मानदेय दिया जा रहा है। किसी गांव में या तो स्कूल खण्डहर में तब्दील हो गए थे या फिर वहां कभी स्कूल थे ही नहीं।

बीजापुर ब्लाॅक के शिक्षा अधिकारी जाकिर खान ने चर्चा में बताया कि जिला खनिज न्यास संस्थान (डीएमएफ) की राशि से गांव में स्कूल के लिए शेडनुमा ढांचा तैयार किया गया। ज्ञानदूतों को भी डीएमएफ से मानदेय दिया जा रहा है।

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उनके ब्लाॅक में गोरना, मनकेली, काकेकोरमा, पदमूर, पेदाजोजेर, पुसनार, कमकानार, मेटापाल, चोखनपाल, बुरजी, पालनार आदि ऐसे गांव हैं जहां शेड बनाने के लिए काफी मशक्कत करना पड़ा क्योंकि सामान ले जाना यहां आसान नहीं है।