एड़समेटा फायरिंग: 8 बरस से जिस्म में एक बुलेट है दफन… घटना के विरोध में हजारों ग्रामीण जमाए हैं गंगालूर में डेरा

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एड़समेटा फायरिंग: 8 बरस से जिस्म में एक बुलेट है दफन… घटना के विरोध में हजारों ग्रामीण जमाए हैं गंगालूर में डेरा

पंकज दाऊद @ बीजापुर। बैलाडिला की तराई में बसे गांव एड़समेटा में सीआरपीएफ की गोलीबारी में 17 मई 2013 को आठ लोग मारे गए और चार लोग जख्मी हुए। इनमें से एक सन्नू कारम को कंघे के पास एक गोली लगी थी और ये गोली आज भी उसके जिस्म में मौजूद है।

यहां से 22 किमी दूर गंगालूर गांव में एड़समेटा और आसपास की पंचायतों के हजारों ग्रामीण दो दिनों से डेरा डाले हुए हैं। उनकी कई मांगें हैं। वे अपने साथ खाने-पीने का सामान और कपड़े लेकर पहुंचे हैं।

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गंगालूर के बाजार में वे दो दिनों से सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। एड़समेटा में मारे गए लोगों के परिजनों को एक-एक करोड़ रूपए और घायलों को पचास-पचास हजार रूपए के मुआवजे की मांग पर वे अड़े हैं।

गांव के ही राजू हेमला कहते हैं कि घटना के दिन गांव के लोग एक बैठक कर रहे थे। वे बीज पण्डुम पर्व को लेकर बैठे थे, तभी चारों ओर से फायरिंग शुरू हो गई। इसमें आठ लोग मौके पर ही मारे गए। पांच लोग घायल हुए।

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घटना में घायल आयतू कारम की मौत पिछले साल हो गई जबकि बुदरू तीन साल पहले मर गया। घायलों का पुलिस ने पहले बीजापुर में इलाज करवाया, फिर उन्हें जगदलपुर रेफर कर दिया गया। मुआवजे के नाम पर फूटी कौड़ी नहीं मिली।

इधर, सीआरपीएफ के दोषी जवानों पर कार्रवाई नहीं हुई। गांव के लोगों ने दोषी जवानों पर कार्रवाई की मांग की है। सन्नू कारम , समलू पूनेम और छोटू कारम को गोली लगी थी। इनमें से सन्नू कारम के शरीर में आज भी ये गोली है।

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समलू पूनेम को भी कंघे में गोली लगी। हॉस्पिटल में उसे नहीं निकाला गया। छोटू कारम के पैर में गोली लगी है। गांव के लोगों ने कहा है कि सारकेगुड़ा और सिलगेर में भी पुलिस ने फायरिंग की । यहां भी दोषी जवानों पर कार्रवाई नहीं हुई। यहां भी घायलों और मृतकों के परिजनों को कोई मुआवजा नहीं मिला।