दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए मार्केट नहीं, धान बीज की डिमाण्ड तीन साल में हुई दो गुनी !

67
There was 113 mm less rain in June this year.

पंकज दाऊद @ बीजापुर। दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए मार्केट का इंतजाम नहीं होने से किसानों की दिलचस्पी सिर्फ धान उत्पादन की ओर बढी है। वहीं आश्चर्यजनक रूप से तीन सालों में ही धान बीज की मांग करीब दो गुनी हो गई है।

There was 113 mm less rain in June this year.

विभागीय सूत्रों के मुताबिक 2018 में किसानों ने 5379 क्विंटल धान बीज खरीदा तो ये आंकड़ा 2019 में बढ़कर 7644.14 क्विंटल हो गया। इस साल तो आश्चर्यजनक तौर पर 10061.94 क्विंटल धान बीज बिका है। इनमें छग सुगंधित, दुर्गेश्वरी, बमलेश्वरी, स्वर्णा, महेश्वरी, महामाया, एमटीयू 1010, एमटीयू 1001, एचएमटी समेत अन्य किस्में शमिल हैं।

Read More: 

 

यह भी पढ़ें :  धान ख्ररीदी केन्द्र में आग लगने से मचा हड़कंप, झोपड़ी में धुंआ उठता देख पहुंचे किसान, फिर...

दलहनी एवं तिलहनी फसलों का बाजार नहीं होने के अलावा समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी भी धान उत्पादन में किसानों की दिलचस्पी का एक सबब है। कृषि विभाग के सहायक संचालक सत्यजीत सिंह कंवर ने बताया कि दलहनी एवं तिलहनी फसलें ज्यादातर भोपालपटनम इलाके के किसान लेते हैं।

इस साल कुछ व्यापारियों को लाॅक डाऊन के दौरान तेलंगाना से दलहनी और तिलहनी फसलों की खरीदी के लिए पास देकर बुलवाया गया था। अभी भी भोपालपटनम इलाके के कुछ किसानों के पास उड़द और मूंगफल्ली बेचने के लिए रखी हुई है लेकिन इसका कोई लेवाल नहीं है।

यह भी पढ़ें :  नक्सल प्रभावित इलाकों के युवाओं को CRPF दे रही ड्राइविंग की ट्रेनिंग, विरोधी विचारधारा के खात्मे का एक तरीका ये भी

कलेेक्टर के माध्यम से इस साल केन्द्र की संस्था नाफेड की ओर से खरीदी के लिए एक मांग पत्र का प्रस्ताव बनाकर ष्षासन को भेजा गया है ताकि किसान दलहनी व तिलहनी फसलों का भी उत्पादन कर सकें। नाफेड की ओर से खरीदी पर किसानों को उनकी उपज का अच्छा दाम मिल जाएगा। सहायक संचालक कंवर ने बताया कि उर्वरक की कोई कमी नहीं है। खासकर यूरिया की एक माह बाद किसानों को जरूरत होगी।

293 गांवों के खेतों तक पहुंच नहीं

एकड़ पीछे उपज उत्पादन हर साल कृषि एवं राजस्व विभाग करते हैं। जिले में 699 गांव हैं और पिछले साल 293 गांवों तक ये दोनों अमले यहां के खेतों तक नहीं पहुंच सके। बताया गया है कि किसी तरह गांव तक तो जाना मुमकिन हो जाता है लेकिन दूर खेतों तक नहीं जा सकते है।

यह भी पढ़ें :  बुर्कापाल हमले के लिए नक्सलियों ने केन्द्र व राज्य सरकार को ठहराया जिम्मेदार

इस वजह से पड़ोसी गांव के खेतों को आधार मानकर उपज का आकलन किया जाता है। फसल कटाई प्रयोग पटवारी और आरएईओ को चार-चार बार करना पड़ता है। फिर पांच साल की औसत उपज के आधार पर उत्पादन का आकलन किया जाता है।

Read More: 

  • आपको यह खबर पसंद आई तो इसे अन्य ग्रुप में Share करें…