अंतिम संस्कार में शामिल होने की ‘फीस’ 10 हजार ? वृद्धा के क्रियाकर्म में जाने पर लगा दी थी समाज ने रोक

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अंतिम संस्कार में शामिल होने की ‘फीस’ 10 हजार ? वृद्धा के क्रियाकर्म में जाने पर लगा दी थी समाज ने रोक

पंकज दाउद @ बीजापुर। बात इसी पखवाड़े की पहली तारीख की है। उस दिन मद्देड़ के अंबेडकर वार्ड की एक वृद्दा समक्का दुर्गम (92) की मौत हो गई। दो मई को उनके अंतिम संस्कार में जाने पर समाज के ओहदेदारों ने ये कहते रोक लगा दी कि उनका तिरस्कार हुआ है।

आरोप है कि पदाधिकारियों ने फैसला लिया कि जो भी समाज से अंतिम संस्कार में जाएगा, उसे 10000 रूपए का जुर्माना पटाना होगा।

अंबेडकर वार्ड की रहने वाली दुर्गम समक्का के दो बेटे व पांच बेटियां थीं करीब 25 साल पहले एक बेटे की मौत हो गई। उनकी तीन बेटियोें की भी मौत हो गई। पहले सभी एक साथ रहते थे। बड़े बेटे दुर्गम सत्यम ने विवाह किया।

सालभर तो ठीक ठाक चला। इसके बाद सास और बहू में रोजाना झगड़े होने लगे। करीब 30 साल पहले सास ने अपनी एक जमीन पर झोपड़ी बना ली और वहां रहने लगी।

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दुर्गम समक्का की एक बेटी शांता ने महार से नहीं, बल्कि आदिवासी से विवाह रचा लिया। एक बेटी राधा कापसे का विवाह रायपुर में हो गया। शांता मरकाम एवं समक्का दुर्गम के नाती रविन्द्र मोरला ने आरोप लगाया कि 30 साल से बेटे सत्यम ने अपनी मां से संपर्क ही नहीं किया और ना ही किसी तरह की मदद की।

झोपड़ी में अकेेली रहने के दौरान प्याज, टोरा, महुआ, धान आदि बेचकर अपनी आजीविका कुछ सालों तक चलाती रही। जब वह अशक्त हो गई तो बेटी शांता के घर आकर रहने लगी। इस बीच उसे लकवा भी मार गया। दो माह पहले ही उसकी तबीयत बिगड़ी।

शांता एवं राधा कापसे ने कई जगह उसका इलाज करवाया। एक मई की दोपहर तीन बजे उसकी मौत हो गई। इलाज के लिए ष्षांता अपनी मां की झोपड़ी वाली जमीन बेचना चाहती थी लेकिन सत्यम ने इसमें भी रोक लगवा दी।

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एक मई को ही महार समाज की जिला इकाई के पदाधिकारी शांता के घर पहुंचे और अंतिम संस्कार बेटे से करवाने की सलाह दी। लेकिन शांता ने ये कहते इंकार कर दिया कि उसके भाई ने 30 साल तक मां की कोई सेवा नहीं की और अंतिम संस्कार का उसका कोई हक नहीं है।

जिला इकाई के पदाधिकारियों के आने पर भी कोई बात नहीं बनी। दूसरे दिन मद्देड़ के महार समाज के जाति नायक (अध्यक्ष) अशोक मोरला एवं उप जाति नायक (उपाध्यक्ष) सड़वली दुर्गम शांता के घर आए और सलाह दी कि शव को बेटेे सत्यम को सौंप दें ताकि अंतिम संस्कार सामाजिक रीति रिवाज से हो सके। लेकिन शांता ने मना कर दिया।

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शांता और रविन्द्र मोरला का आरोप है कि इसके बाद समाज के पदाधिकारियों ने समाज के लोगों से कहा कि जो भी अंतिम संस्कार मेे जाएगा, उसे दस हजार रूपए का जुर्माना देना होगा। अंतिम संस्कार मे बाहर से रिष्तेदार आए और इक्का दुक्का रिश्तेदार मद्देड़ के भी थे। करीब 200 लोग अंतिम संस्कार में शामिल हुए।

आरोप झूठा और बेबुनियाद

समाज के अध्यक्ष अशोक मोरला ने इस आरोप को बेबुनियाद व झूठा करार देते कहा कि वे समझौता कराने गए थे और अंतिम सस्कार बेटे से करवाना चाहते थे। शांता के घर में उन्हें तिरस्कार मिला और शव भी नहीं सौंपा गया।

जहां तक जुर्माने की बात है, ऐसा फैसला नहीं लिया गया। गांव से कई लोग गए थे। ऐसा होता तो वे जुर्माना देते। मां बेटे के बीच पुराना विवाद है और समाज को इससे सरोकार नहीं है।